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सुश्रुत द्वारा विकसित शल्य चिकित्सा के पुरातात्विक प्रमाण प्रदर्शित

"भारतीय पुरातत्व एवं विज्ञान की दीर्घ परंपरा" पर कांस्टीट्युशन क्लब में इंडोलजी फ़ाउंडेशन की ओर से एक विमर्श का आयोजन किया गया। इस अवसर पर फ़ाउंडेशन के संस्थापक ललित मिश्र ने तक्षशिला में सर जान मार्शल द्वारा किये गये उत्खननन में प्राप्त शल्य चिकित्सा के उपकरणों का सचित्र प्रदर्शन किया। उन्होंने बताया कि तक्षशिला का उत्खनन सन 1913 में शुरु किया जो लगभग दो दशकों तक चला, जिसमें भारतीय शल्य
चिकित्सा के लगभग तेरह उपकरण प्राप्त हुए। जॉन मार्शल ने अपनी रिपोर्ट में इसे प्रकाशित किया। इस पर पाकिस्तान से भी एक शोध पत्र प्रकाशित हुआ, लेकिन आगे चल कर यह महत्वपूर्ण प्रमाण मुख्यधारा के इतिहास से विस्मृत हो गया। इस वजह से वैश्विक स्तर पर प्राचीन भारतीय शल्य चिकित्सा की मान्यता स्थापना नहीं हो सकी। अब इस तथ्य के सामने आने पर अब वैश्विक मान्यता प्राप्त हो सकेगी।

उन्होंने हडप्पा के अनेक स्थलों से प्राप्त आयुर्वेदिक औषधियों का विवरण दिया, जिनमें औषधि त्रिफ़ला के अवयव एवं शिलाजीत प्रमुख हैं। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि नव निर्वाचित सांसद एवं भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता डा सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि भारतीय ज्ञान-विज्ञान की परंपरा के प्रमाणों पर मानक शोधपत्र लिखे जायें ताकि वैश्विक स्तर विज्ञान की हमारी विरासत को प्रतिष्ठित किया जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि संस्कृत विज्ञान की संवाहिका रही है, जिसके द्वारा हमारी परंपरा अक्षुण्ण रही है।

कार्यक्रम में उपस्थित वरिष्ठ इतिहासविद प्रो दीनबंधु पांडेय ने कहा कि तक्षशिला आयुर्वेदिक परंपरा का प्राचीन केंद्र रहा है। वहां से शल्य चिकित्सा के उपकरणों की प्राप्ति से विज्ञान के इतिहास के नये अध्याय की शुरुआत होती है।

इस अवसर पर जेएनयू से प्रोफ़ेसर बी एन प्रसाद, एमिटी विवि मानेसर से प्रो सुनील मिश्र, फ़ाउंडेशन के ट्र्स्टी प्रवीण मिश्र एवं अनूप कुमार शर्मा, अन्य गणमान्य नागरिक तथा जेएनयू एवं दिल्ली विवि के छात्र उपस्थित रहे।



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